Gurudwara Gobind Ghat | गुरुद्वारा श्री गोबिंद घाट | ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸ੍ਰੀ ਗੋਬਿੰਦ ਘਾਟ

गुरुद्वारा श्री गोबिंद घाट

गुरुद्वारा श्री गोबिंद घाट अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है और हेमकुंड साहिब की पवित्र यात्रा का मुख्य प्रारंभिक स्थल माना जाता है। श्रद्धालु आगे की यात्रा से पहले यहाँ विश्राम करते हैं और फिर पैदल या खच्चरों के माध्यम से यात्रा जारी रखते हैं।

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गुरुद्वारा गोबिंद धाम | ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਗੋਬਿੰਦ ਧਾਮ

गुरुद्वारा गोबिंद धाम

गुरुद्वारा श्री गोबिंद धाम जी, भामियां कलां लुधियाना में स्थित एक शांत स्थान है जहाँ श्रद्धालु अरदास, कीर्तन और सेवा के माध्यम से आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

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Gurudwara Teer Garhi Sahib | गुरुद्वारा तीर गढ़ी साहिब | ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਤੀਰ ਗੜ੍ਹੀ ਸਾਹਿਬ

गुरुद्वारा तीर गढ़ी साहिब

गुरुद्वारा तीर गढ़ी साहिब, भंगानी में स्थित वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ सन् 1688 में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने पहाड़ी राजाओं के विरुद्ध अपना पहला युद्ध लड़ा। यह स्थल सिख इतिहास में साहस, धर्म और न्याय की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

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Gurudwara Sehra Sahib

गुरुद्वारा सेहरा साहिब, बस्सी

गुरुद्वारा सेहरा साहिब हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित एक पवित्र स्थान है, जहां श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने विवाह से पूर्व विश्राम किया और परंपरा अनुसार सेहरा धारण किया था।

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Gurudwara Sri Dastar Asthan Sahib | गुरुद्वारा श्री दस्तार अस्थान साहिब | ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸ੍ਰੀ ਦਸਤਾਰ ਅਸਥਾਨ ਸਾਹਿਬ

गुरुद्वारा श्री दस्तार अस्थान साहिब

गुरुद्वारा श्री दस्तार अस्थान साहिब एक पवित्र स्थल है जहाँ कलगीधर पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज प्रकृति के बीच बैठकर अपनी दस्तार बाँधते थे। भंगाणी साहिब के युद्ध के बाद यहीं पीर बुधु शाह जी को गुरु जी द्वारा दस्तार और कंघा सिरोपा रूप में प्रदान किया गया, जो इस स्थान के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्त्व को दर्शाता है।

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Gurudwara Suhela Ghora | गुरुद्वारा सुहेला घोड़ा | ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸੁਹੇਲਾ ਘੋੜਾ

गुरुद्वारा सुहेला घोड़ा

गुरुद्वारा सुहेला घोड़ा साहिब वर्ष 1635 में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के आगमन का स्मारक है और जान भाई व सुहेला घोड़ा से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को दर्शाता है।

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Chhota Ghallughara | गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा- गुरदासपुर

गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा- गुरदासपुर

गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा साहिब, गुरदासपुर के काहनुवान क्षेत्र के निकट स्थित है। यह स्थल 1746 ईस्वी के छोटे घल्लुघारे की स्मृति से जुड़ा है, जब मुगल अत्याचारों के दौरान हजारों सिखों ने अपने धर्म की रक्षा हेतु बलिदान दिया। यह गुरुद्वारा सिखों के साहस, त्याग और अडिग आस्था का प्रतीक माना जाता है।

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