गुरुद्वारा मोती बाग साहिब, दिल्ली सिख इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण और पवित्र स्थान है, जो दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की दिल्ली आगमन की स्मृति को समर्पित है। सन 1707 में गुरु गोबिंद सिंह जी खालसा फौज के साथ यहां आकर ठहरे थे। उस समय इस स्थान को मोची बाग कहा जाता था, जो बाद में मोती बाग के नाम से प्रसिद्ध हो गया। गुरु साहिब ने यहां रहते हुए सिख धर्म के प्रचार और खालसा पंथ की मजबूती के लिए महत्वपूर्ण समय बिताया।
इतिहास के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी असाधारण तीरंदाजी का प्रदर्शन करते हुए मोती बाग से लाल किले की ओर तीर चलाया। कहा जाता है कि वह तीर बादशाह बहादुर शाह के सिंहासन के पास जाकर लगा। इस अद्भुत निशानेबाजी को पहले चमत्कार माना गया, लेकिन गुरु साहिब द्वारा भेजे गए दूसरे तीर के साथ एक संदेश था कि यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि तीरंदाजी की कला है। इस घटना से बहादुर शाह गुरु साहिब की महानता और व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुआ।
आज गुरुद्वारा मोती बाग साहिब एक शांत और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में जाना जाता है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु माथा टेकने और गुरु साहिब की स्मृति से जुड़ने के लिए आते हैं। यहां संरक्षित देहरी उस स्थान की याद दिलाती है, जहां से गुरु गोबिंद सिंह जी ने तीर चलाया था। यह स्थान सिख इतिहास, वीरता और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।


