
गुरुद्वारा बीबी कौलां जी श्री कौलसर साहिब
गुरुद्वारा बीबी कौलां जी श्री कौलसर साहिब गुरुद्वारा बीबी कौलां जी श्री कौलसर साहिब पंजाब

गुरुद्वारा बीबी कौलां जी श्री कौलसर साहिब गुरुद्वारा बीबी कौलां जी श्री कौलसर साहिब पंजाब

गुरुद्वारा करमसर राड़ा साहिब, लुधियाना के निकट स्थित एक पवित्र स्थल है। गुरु हरगोबिंद जी के आगमन और संत ईश्वर सिंह जी व संत किशन सिंह जी की सेवा से यह स्थान आध्यात्मिक केंद्र बना। आज भी यह श्रद्धालुओं के लिए गहन आस्था और शांति का प्रतीक है।

गुरुद्वारा अड़ीसर साहिब बरनाला–बठिंडा मार्ग पर स्थित ऐतिहासिक गुरुधाम है। यह पवित्र स्थान गुरु तेग बहादुर जी की चरण छोह से जुड़ा है और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र माना जाता है। यहां सच्चे मन से की गई अरदास को अटके कार्यों की पूर्ति करने वाला माना जाता है।

गुरुद्वारा नौलखा साहिब, फतेहगढ़ साहिब ज़िले के गांव नौलखा में स्थित एक पवित्र स्थल है। इसका संबंध गुरु तेग बहादुर जी और लख़ी शाह वंजारा की ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है, जहाँ नौ टके को नौ लाख के समान आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

गुरुद्वारा टाहली साहिब (संतोखसर) अमृतसर में स्थित एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है, जो गुरु अर्जन देव जी से संबंधित है। संतोखसर सरोवर को अमृतसर का पहला खुदवाया गया सरोवर माना जाता है, जिसकी शुरुआत गुरु अमर दास जी के आदेश से हुई और बाद में गुरु अर्जन देव जी द्वारा पूर्ण कराया गया।

गुरुद्वारा भाई मंझ जी पंजाब के जिला होशियारपुर के गाँव कंगमाई में स्थित है। यह पवित्र स्थल भाई मंझ जी की निस्वार्थ सेवा और गुरु अर्जन देव जी के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा की स्मृति में समर्पित है, जो सिख इतिहास में सेवा और विश्वास का प्रेरणास्रोत माना जाता है।

गुरुद्वारा भंडारा साहिब नानकमत्ता में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जो गुरु नानक देव जी की तीसरी उदासी से जुड़ा है। यहाँ योगियों को बरगद के वृक्ष से भोजन प्राप्त होने की अद्भुत घटना प्रसिद्ध है।

गुरुद्वारा साहिब छेवीं पातशाही, नवाबगंज एक पवित्र सिख स्थल है, जहां गुरु हरगोबिंद साहिब जी के आगमन की स्मृति जुड़ी है। यह स्थान संगत, कीर्तन और लंगर की परंपरा के साथ श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति का केंद्र बना हुआ है।

गुरुद्वारा सोहिआणा साहिब पातशाही नौवीं, जिला बरनाला के गांव सोहिआणा में स्थित है। यह पवित्र स्थान गुरु तेग बहादुर जी की मालवा यात्रा से जुड़ा हुआ है, जहां उनके घोड़े के रुकने को दिव्य संकेत माना गया और आज भी यहां से जुड़ी ऐतिहासिक निशानियां श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं।
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