
गुरुद्वारा बड़ी संगत – वाराणसी
गुरुद्वारा बड़ी संगत वाराणसी का एक ऐतिहासिक सिख तीर्थ है जहाँ गुरु तेग बहादुर साहिब जी 7 महीने 13 दिन ठहरे थे। यहाँ बावली गंगा परगट का पवित्र स्थान और गुरु जी से जुड़े कई ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित हैं।

गुरुद्वारा बड़ी संगत वाराणसी का एक ऐतिहासिक सिख तीर्थ है जहाँ गुरु तेग बहादुर साहिब जी 7 महीने 13 दिन ठहरे थे। यहाँ बावली गंगा परगट का पवित्र स्थान और गुरु जी से जुड़े कई ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित हैं।

गुरुद्वारा गुप्तसर साहिब, छत्तियाना गांव (श्री मुक्तसर साहिब) में स्थित एक पवित्र स्थल है, जहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी के आगमन और पीर सैय्यद इब्राहिम के सिख धर्म स्वीकार करने की ऐतिहासिक घटना से यह स्थान प्रसिद्ध है।

गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर नौवीं पातशाही, छोटा मिर्ज़ापुर, गुरु तेग बहादुर जी और गुरु गोबिंद सिंह जी की पावन यात्रा की स्मृति में स्थापित एक ऐतिहासिक स्थल है। यह गुरुद्वारा वाराणसी–राबर्ट्सगंज मार्ग पर स्थित है और 1980 के दशक में निर्मित वर्तमान भवन श्रद्धालुओं के सहयोग से संचालित होता है।

गुरुद्वारा टोका साहिब हरियाणा–हिमाचल सीमा के पास स्थित पवित्र स्थल है, जो गुरु गोबिंद सिंह जी की नाहन यात्रा की स्मृति में स्थापित है। यहाँ गुरु जी ने अपने आगमन और वापसी के दौरान प्रवास किया था।

गुरुद्वारा श्री कंघा साहिब पातशाही दसवीं, सुल्हर गांव में स्थित एक पवित्र ऐतिहासिक स्थल है, जहां श्री गुरु गोबिंद सिंह जी लखनौर से यात्रा करते हुए पधारे थे। यह स्थान गुरु जी के पावन आगमन और उनसे जुड़ी स्मृतियों के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

गुरुद्वारा श्री गोबिंद घाट अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है और हेमकुंड साहिब की पवित्र यात्रा का मुख्य प्रारंभिक स्थल माना जाता है। श्रद्धालु आगे की यात्रा से पहले यहाँ विश्राम करते हैं और फिर पैदल या खच्चरों के माध्यम से यात्रा जारी रखते हैं।

गुरुद्वारा तीर गढ़ी साहिब, भंगानी में स्थित वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ सन् 1688 में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने पहाड़ी राजाओं के विरुद्ध अपना पहला युद्ध लड़ा। यह स्थल सिख इतिहास में साहस, धर्म और न्याय की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

गुरुद्वारा सेहरा साहिब हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित एक पवित्र स्थान है, जहां श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने विवाह से पूर्व विश्राम किया और परंपरा अनुसार सेहरा धारण किया था।

गुरुद्वारा श्री दस्तार अस्थान साहिब एक पवित्र स्थल है जहाँ कलगीधर पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज प्रकृति के बीच बैठकर अपनी दस्तार बाँधते थे। भंगाणी साहिब के युद्ध के बाद यहीं पीर बुधु शाह जी को गुरु जी द्वारा दस्तार और कंघा सिरोपा रूप में प्रदान किया गया, जो इस स्थान के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्त्व को दर्शाता है।
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