गुरुद्वारा गुरुबाग साहिब - वाराणसी
गुरुद्वारा गुरुबाग साहिब उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर वाराणसी में स्थित है, जिसे प्राचीन समय में बनारस कहा जाता था। प्रथम पातशाह श्री गुरु नानक देव जी अपनी पहली उदासी (धर्म प्रचार यात्रा) के दौरान वर्ष 1507 में वाराणसी पहुंचे। शिवरात्रि के दिन गुरु जी एक शांत और हरे-भरे बाग में विश्राम करने के लिए रुके।
वहां बैठते समय भाई मरदाना जी ने गुरु जी से बाग के मालिक के बारे में पूछा। गुरु नानक देव जी ने उत्तर दिया कि सम्पूर्ण सृष्टि का असली मालिक परमात्मा है, और जिस व्यक्ति को इस स्थान की सेवा सौंपी गई है वह स्वयं ही यहां आ जाएगा। इसके बाद गुरु जी ने भाई मरदाना जी को रबाब बजाने के लिए कहा। मरदाना जी ने इतनी मधुर धुन बजाई कि आसपास के लोग उस दिव्य संगीत से आकर्षित होकर वहां एकत्र होने लगे।
उसी समय काशी के प्रसिद्ध पंडित और उस बाग के संरक्षक पंडित गोपाल शास्त्री भी वहां पहुंचे। आध्यात्मिक वातावरण से प्रभावित होकर उन्होंने गुरु जी के चरणों में माथा टेका। गुरु जी ने उन्हें स्नेहपूर्वक उठाया। गुरु जी की सादगी देखकर पंडित गोपाल आश्चर्यचकित हुए, क्योंकि गुरु जी के पास न शालिग्राम था, न तुलसी की माला, न जपमाला और न ही माथे पर कोई तिलक। उनके मन में प्रश्न उठा कि बिना इन प्रतीकों के गुरु जी किस प्रकार उपासना करते हैं। तब गुरु जी ने भाई मरदाना जी को पुनः रबाब बजाने के लिए कहा और एक शबद का उच्चारण करते हुए समझाया कि सच्चा शालिग्राम परमात्मा का नाम है और सच्ची माला अच्छे कर्म हैं। उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति बाहरी प्रतीकों में नहीं बल्कि सच्चे स्मरण और नेक जीवन में है।
गुरु जी के आगमन का समाचार शीघ्र ही पूरे नगर में फैल गया और लोग बड़ी श्रद्धा से उनके दर्शन के लिए आने लगे। उसी समय चतुर दास नाम का एक विद्वान भी वाराणसी आया, जो अपने ज्ञान और अहंकार के लिए प्रसिद्ध था। गुरु जी की बढ़ती प्रतिष्ठा से वह विचलित हुआ और उनसे शास्त्रार्थ करने का विचार लेकर आया। गुरु जी की विनम्रता से प्रभावित होने के बावजूद उसका अहंकार समाप्त नहीं हुआ। उसने अपने संदेह दूर करने की इच्छा व्यक्त की। गुरु जी ने उसके मनोभाव को समझते हुए कहा कि उसके प्रश्नों का उत्तर एक कुत्ता देगा।
गुरु जी ने बताया कि वह कुत्ता अपने पिछले जन्म में गंगा राम नाम का एक विद्वान परंतु अहंकारी पंडित था, जिसे अपने अभिमान के कारण श्राप मिला था। जब चतुर दास उस कुत्ते को वहां लाया, तो गुरु जी ने उसे पुकारा और संगत के सामने वह कुत्ता पुनः मनुष्य रूप में परिवर्तित हो गया।
गंगा राम ने बताया कि पिछले जन्म में वह दूसरों को नीचा दिखाने के लिए वाद-विवाद करता था। एक संत से भी उसने बार-बार बहस करने का प्रयास किया। अंततः संत ने उसके व्यवहार को कुत्ते के भौंकने जैसा कह दिया, जो श्राप बन गया और वह कुत्ते के रूप में जन्मा। गुरु नानक देव जी की कृपा से ही उसे उस जीवन से मुक्ति मिली।
यह चमत्कार देखकर चतुर दास को गहरा पश्चाताप हुआ। उसने गुरु जी से पूछा कि अच्छे और बुरे कर्मों में भेद कैसे किया जाए। तब गुरु जी ने मूल मंत्र और सलोक सहसकृति के उपदेश सुनाते हुए समझाया कि सच्ची भक्ति सत्य जीवन, विनम्रता और परमात्मा के स्मरण में है, न कि कर्मकांड या अहंकार में।
गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद गंगा राम ने शांतिपूर्वक शरीर त्याग दिया और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। पंडित गोपाल शास्त्री इस दिव्य परिवर्तन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस बाग को गुरु जी को समर्पित कर दिया। तभी से यह स्थान गुरुद्वारा गुरुबाग साहिब के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
यहाँ गुरुद्वारा गुरुबाग साहिब, वाराणसी तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग दिए गए हैं:
सड़क मार्ग से: गुरुद्वारा गुरुबाग साहिब वाराणसी शहर के भीतर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। शहर के विभिन्न हिस्सों से ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और स्थानीय बसें आसानी से उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग से: वाराणसी जंक्शन (वाराणसी कैंट) निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जो गुरुद्वारा से लगभग 4–5 किमी की दूरी पर स्थित है। रेलवे स्टेशन से आप ऑटो या कैब द्वारा आसानी से गुरुद्वारा पहुँच सकते हैं।
हवाई मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (वाराणसी एयरपोर्ट) है, जो गुरुद्वारा से लगभग 25 किमी दूर स्थित है। हवाई अड्डे से शहर तक टैक्सी और ऐप आधारित कैब सेवाएँ उपलब्ध हैं।
यात्रा पर निकलने से पहले, अपने स्थान के अनुसार वर्तमान परिवहन समय-सारणी और उपलब्धता की जांच करना उचित है।
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