गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा- गुरदासपुर

1740 ईस्वी में, अमृतसर स्थित हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के मुगल अधिकारी एवं संरक्षक मस्सा रंगड़ ने एक अत्यंत निंदनीय कृत्य किया। उसने हरमंदिर साहिब को अपना निजी निवास बना लिया और वहाँ जुआ खेलना व शराब पीने जैसी अनैतिक गतिविधियाँ शुरू कर दीं। इससे सिख समुदाय की भावनाएँ गहराई से आहत हुईं। इस अपमान का बदला लेने के लिए भाई सुखा सिंह और भाई मेहताब सिंह ने साहसिक कदम उठाया और मस्सा रंगड़ का वध कर दिया। इस घटना के बाद हरमंदिर साहिब की मर्यादा पुनः स्थापित हुई और भाई सुखा सिंह की ख्याति खालसा पंथ में अत्यधिक बढ़ गई। शीघ्र ही वे एक अलग जत्थे के नेता के रूप में उभर कर सामने आए।

इसके कुछ वर्षों बाद, 1746 के प्रारंभ में, भाई सुखा सिंह ने सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया के साथ मिलकर गुजरांवाला ज़िले के एमिनाबाद की ओर कूच किया। वहाँ उनकी मुठभेड़ जसपत राय से हुई, जो एक स्थानीय जागीरदार था और लाहौर के मुगल सूबेदार याहिया ख़ान के दीवान लखपत राय का भाई था। एक संक्षिप्त संघर्ष के दौरान जसपत राय मारा गया। इस घटना ने लखपत राय को अत्यंत क्रोधित कर दिया और उसने अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने की ठान ली।

इसके परिणामस्वरूप, लखपत राय ने लाहौर में सिखों की धर-पकड़ शुरू करवाई। अनेक सिखों को शाहिद गंज में शहीद किया गया और गुरु ग्रंथ साहिब जी के पवित्र स्वरूपों का अपमान किया गया। इतना ही नहीं, हरमंदिर साहिब को भी लूटा गया और उसके पवित्र सरोवर में रेत भर दी गई, जो सिख आस्था के प्रति घोर अनादर का प्रतीक था।

मई 1746 में स्थिति और भी भयावह हो गई जब याहिया ख़ान और लखपत राय के नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना ने खालसा दल पर आक्रमण किया। सिख पहले तो लाहौर के उत्तर की ओर हटे, लेकिन आगे उनका मार्ग पहाड़ी रियासतों की सेनाओं ने रोक लिया। कुछ सिख संघर्ष करते हुए पहाड़ों की ओर निकलने में सफल हुए, जबकि अन्य बारी दोआब पार कर दूसरे सिख जत्थों से मिलने का प्रयास करने लगे। अंततः सिखों को काहनुवान के निकट दलदली क्षेत्रों में घेर लिया गया।

इस भीषण संघर्ष में लगभग 7,000 सिख शहीद हो गए और करीब 3,000 सिखों को बंदी बनाकर लाहौर ले जाया गया, जहाँ उन्हें शाहिद गंज में शहीद कर दिया गया। सिख इतिहास का यह अत्यंत दर्दनाक अध्याय ‘छोटा घल्लुघारा’ या ‘लघु नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है, जो उस दौर में सिख समुदाय द्वारा सहे गए अपार कष्टों और बलिदानों का प्रतीक है।

गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा साहिब पहुँचने के लिए आप अपनी सुविधा और स्थान के अनुसार विभिन्न परिवहन साधनों का उपयोग कर सकते हैं। नीचे प्रमुख विकल्प दिए गए हैं:

  1. कार या टैक्सी द्वारा: यदि आपके पास निजी वाहन है या आप टैक्सी लेना चाहते हैं, तो आप सीधे गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा साहिब तक ड्राइव कर सकते हैं। मार्गदर्शन के लिए मोबाइल में जीपीएस या मैप्स ऐप का उपयोग करें। ऐप में गुरुद्वारा का पता डालकर आसानी से रास्ता पाया जा सकता है।

  2. रेल द्वारा: गुरुद्वारा छोटा घल्लुघारा साहिब का निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन गुरदासपुर रेलवे स्टेशन है (स्टेशन कोड: GSP)। अपने स्थान से उपलब्ध सुविधाजनक ट्रेन द्वारा आप गुरदासपुर पहुँच सकते हैं।

  3. बस द्वारा: गुरदासपुर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। गुरदासपुर बस स्टैंड पहुँचने के बाद, आप स्थानीय टैक्सी या ऑटो लेकर काहनुवान जा सकते हैं, जहाँ से गुरुद्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।

  4. हवाई मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा श्री गुरु राम दास जी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अमृतसर (IATA: ATQ) है, जो गुरुद्वारा साहिब से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है। हवाई अड्डे से आप टैक्सी या राइडशेयरिंग सेवा लेकर गुरुद्वारा साहिब पहुँच सकते हैं।

यात्रा पर निकलने से पहले अपने स्थान के अनुसार वर्तमान परिवहन सुविधाओं और समय-सारिणी की जाँच करना उचित रहेगा। साथ ही, काहनुवान पहुँचने के बाद स्थानीय लोगों से मार्गदर्शन लेना भी सहायक हो सकता है।

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